देश के भविष्य का निजीकरण कर रही हमारी नई शिक्षा नीति

0
204

80-90 के दशक में सरकारी स्कूल में पड़ना बुद्धिमान छात्रों की श्रेणी में आता था। तब स्कूल की बिल्डिंग से ज्यादा महत्व वहां के शिक्षकों की योग्यता और अनुभव का होता था। उस समय छात्र को प्रवेश फीस से नहीं प्रावीण्य सूची के आधार पर मिलता था, उन्हीं स्कूलों से निकले छात्र आज कई कम्पनियों के सीईओ बने, प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर आदि महत्वपूर्ण पदों पर बने रहे। जब हमारा पुराना ढांचा इतना अच्छा था तो इसे क्यों और कैसे खत्म किया जा रहा है? तथ्यात्म आधार पर समझें।
1992 से नव-उदारवादी नीतियों का पदार्पण हुआ इन्हीं नीतियों के तहत सबसे पहले 2000 से पूर्व के कर्मचारियों की पेंशन बन्द की गई जिससे लोग निजी स्कूल में भी नौकरी करने जाने लगे। उसके बाद सरकारी शिक्षकों की स्थायी नियुक्तियां खत्म की गई, साथ ही शिक्षकों को स्कूल के अतिरिक्त अन्य कार्यों में लगाया गया। इससे सरकारी स्कूल के रिजल्ट प्रभावित होने लगे और आमजन का मोह भंग होने लगा।
सरकारी स्कूलों में फिर संविदा शिक्षकों की भर्ती, जिसमें उन्हें दिवस के अनुसार मानदेय मिलना ततपश्चात अब घंटे के अनुसार मानदेय की बात भी चालू है। अभी अतिरिक्त शिक्षकों की छंटनी करना ताकि भविष्य में इन्हें सेवा मुक्त किया जा सके। ये सभी कदम धीरे-धीरे सरकारी स्कूल को बंद करने के लिए ही है। निजी स्कूलों को पोषित कैसे किया जाए इसके लिए स्कालरशिप योजना भी लाई गई ताकि गरीब बच्चे भी महंगी स्कूल में पड़ सके। अगर एक स्कूल का अनुमानित स्कॉलरशिप खर्च भी निकाले तो उतने पैसे से भी सरकारी तनख्वाह के साथ सभी को नि:शुल्क पढ़ाई मिल सकती है लेकिन सरकार तो सार्वजनिक पूंजी को निजी पूंजी में बदलने के लिए कर्तव्यबद्ध है इसलिए वो ऐसा नहीं करेगी।
अभ नीति आयोग ने केंद्र सरकार से अनुशंसा की है कि सभी सरकारी स्कूल को निजी हाथों में दिया जाए और इसी पर शिक्षामंत्री का बयान आया कि हम निजी कम्पनी से कहेंगे कि आप स्कूल का नाम अपनी कम्पनी के नाम से रख लें और प्रिंसिपल का खर्च भी उठा लें। ये सभी बातें धीरे-धीरे सरकारी व्यवस्था को खत्म करने की दिशा में ही है। निजीकरण से देश को कोई फायदा नहीं होने वाला सिर्फ कम्पनियों को ही छूट दी जा रही है। पालकों को लूटने की और शिक्षकों का शोषण करने की।
इस लड़ाई को अकेले शिक्षक नहीं लड़ सकते। इसमें छात्रों और उनके अभिभावकों भी साथ लाना होगा और मुख्य जड़ निजीकरण के खिलाफ लड़ना होगा। ये काम शिक्षक से ज्यादा अच्छा कोई नहीं कर सकता क्योंकि उसकी बात सभी सुनते है और उसका कार्य क्षेत्र बहुत विस्तृत होता है।
तरूण मंडलोई, सामाजिक कार्यकर्ता

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here