न्याय सोता रहता है..शिवानी-प्रद्युम्न मरते रहेंगे..आप और हम डरते रहेंगे..!

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इंदौर के तीन दरिंदों ने 24 जून 2012 की रात न्यू पलासिया में लक्ष्मी मेमोरियल हॉस्पिटल के पास अपने घर के सामने बारात देख रही चार वर्षीय शिवानी को ऑटो में बैठाया और मालवीय नगर के सुनसान इलाके में ले गए। वहां ज्यादती के बाद उसकी हत्या कर दी थी। तीनों हत्यारों को 26 अप्रैल 2013 को जिला कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी। जिला कोर्ट के बाद केस सुप्रीम कोर्ट गया वहां भी फांसी बरकरार रही। राष्ट्रपति ने भी दया याचिका ख़ारिज करदी। तभी दिल्ली के एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में अपराधियों की फांसी को रोके जाने के लिए याचिका दायर की थी। इसी बीच उस एनजीओ की वकील साहिबा अपराधियों से मिलने इंदौर सेंट्रल जेल आई थीं। जेल से मेरे पास कॉल आया तरुण कोई मैडम दिल्ली से आई हैं शिवानी केस के मामले में, आ जाओ कुछ निकल जाएगा तुम्हारे काम का। मैं वहां पहुंचा। जेलर साहब के ऑफ़िस में बैठे, नॉर्मल बात चीत हुई। मेरा दिमाग बात चीत के दौरान ही ख़राब हो गया था। मैडम को हत्यारों में इंसान दिख रहे थे और मैडम में मुझे पूतना नज़र आ रही थी।

थोड़ी देर बाद बाहर आए मैंने मैडम से माफ़ी मांगी और उनके हाथ में जोर से चिमटी काट दी। वो एक दम चिल्लाई, आंखों में आंसूं जैसे आ गए। बदतमीज़ इडियट बास्टर्ड और पता नहीं क्या क्या तमाम गालियों की बारिश मुझ पर करदी, इसके लिए मैं पहले से तैयार था। हालांकि थप्पड़ की उम्मीद थी लेकिन बच गया। मैडम को नॉर्मल किया फ़िर मैडम से पूछ आपकी उम्र कितनी है ? छब्बीस साल। फ़िर मैन पूछा शिवानी की उम्र ? मैडम बोली हां चार साल थी उस बच्ची की उम्र। तब मैंने कहा वो चार साल की बच्ची थी, उसे तीन दरिंदों ने नोचा खरोचा दुष्कर्म किया फ़िर गला घोंट कर मार दिया। उसके बाद लाश को नाले में फेंक दिया। आपको एक चिमटी काटी तो आपने जमाने भर की गालियां मुझे देदी। कभी उस बच्ची के बारे में सोचा उस पर क्या बीती होगी। अब गुनहगारों की सज़ा मुकर्रर की गई है तो आप ह्यूमन राइट्स की मशाल ले आई हैं। मैंने मैडम से कहा आप बेवकूफ हो, पढ़ी लिखी गंवार हो। मैडम बोली सर प्लीज़ माइंड योर लैंग्वेज। मैंने कहा ओके और चुप हो गया। मैडम और मैं दोनों जेल के बाहर थोड़ी देर बैठे रहे। मैडम के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। थोड़ी देर बाद मैडम बोली आपने मुझे उलझा दिया रास्ते से भटका दिया है। मैंने कहा मैं बस इतना जानता हूं कि ये सामाज की गंदगी है इन्हें सज़ा तो मिलनी ही चाहिए। मैडम ने मेरा नंबर लिया दो बार कॉल भी आए, केस के सिलसिले में बात हुई। फ़िर सीधे ख़बर ही आई कुछ दिनों पहले के अख़बार में “शिवानी के गुनहगारों की फांसी टली”। हो गया न्याय।

श्री तरुण व्यास
श्री तरुण व्यास

अब कल ही दिल दहला देने वाला मामला गुड़गांव के रेयान इंटरनेशनल स्कूल से आया है। सात साल के प्रद्युम्न को स्कूल के ही कंडक्टर ने स्कूल के टॉयलेट में दुष्कर्म के प्रयास के चलते प्रद्युम्न का चाकू से गला रेतकर हत्या करदी। टीवी दिखा रहा है बच्चे के रोते बिलखते बेसुद परिजनों का दर्द, जिसे देखने के लिए हिम्मत चाहिए जो मुझ में तो नहीं है। ज़रा भर देखने से घर के बच्चों की फ़िक्र आंखों के सामने दौड़ पड़ती है। टीवी पर ही बताया जा रहा है दरिंदे कंडक्टर का कबूलनामा। जो कह रहा है मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी, मुझसे गलती हो गई ! क्या इसे सिर्फ़ गलती कहा जाए ? थोड़ा दिमाग पर ज़ोर डालेंगे तो पता चल जाएगा इस तरह के कितने ही घिनोने अपराधों का ढेर लगा है हमारे इस न्यू इंडिया वाले देश में। क्या किया जाना चाहिए इस तरह के अपराधियों के साथ? क्या हमारा कानून अपराधियों को ऐसी कोई सज़ा नहीं दे सकता जिससे किसी के मन मे इस तरह के अपराध का विचार आने भर से रूह कांप उठे। एक अपराधी की वजह से केवल एक नहीं मरता कई लोग जीते जी मौत का सामना करते हैं। राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका ख़ारिज किए जाने के बाद भी शिवानी के गुनहगारों की फांसी टाल दी जाती है! गोरखपुर के सैकड़ों बच्चों का कोई गुनहगार नहीं मिलता ! बलात्कारी छूट जाते हैं। ऐसे हालातों में अब प्रद्युम्न को न्याय दिलाने की उम्मीद करें भी तो किससे। क्योंकि न्याय व्यवस्था की लफ्फाजियों से अटा पड़ा है इतिहास। लोग मरते रहते हैं, अपराधी बचते रहते हैं। ह्यूमन राइट्स अपराधियों के लिए जागता रहता है। वकील साहिब की तरह हमारा कानून भी भटकता रहता है। न्याय सोता रहता है। शिवानी प्रद्युम्न मरते रहेंगे। आप और हम डरते रहेंगे।

(पत्रकार श्री तरुण व्यास की वॉल से साभार)

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