लिव इन में शादी का ड्रामा यंगस्टर्स को आया खूब पसंद, पढ़े मूवी रिव्यू

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इंदौर। लिव इन रिलेशनशिप को हमारे कानून ने भले ही मान्यता दे दी हो, मगर आज भी समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग उसे अच्छी निगाह से नहीं देखता। उनके लिए शादी का पवित्र बंधन ही सर्वोपरि है, जबकि आज का यूथ अपने पार्टनर के मामले में अंधा फैसला करने के मूड में नहीं है। वह अपने जीवनसाथी को जांच-परख कर चुनना चाहता है, ऐसी ही दो अलग सोच रखनेवाले किरदारों को पिरोकर निर्देशक लक्ष्मण उतेकर ने ‘लुका छुपी’ की कहानी बुनी है, जहां नायक गुड्डू (कार्तिक आर्यन) का मानना है कि अगर प्यार है, तो उस प्यार को मजबूत करने के लिए शादी क्यों न कर ली जाए, जबकि नायिका (रश्मि) का मानना है कि भले प्यार हो, मगर लिव इन करके आजमाने में क्या हर्ज है कि उसका पार्टनर जिंदगी भर साथ निभाने के लिए सही है या नहीं ?
कहानी: फिल्म की कहानी मथुरा जैसे छोटे से शहर की है, जहां गुड्डू एक लोकल केबल चैनल का स्टार रिपोर्टर है। रश्मि एक राजनीतिक दल और संस्कृति ग्रुप के सर्वेसर्वा त्रिवेदी जी (विनय पाठक) की इकलौती बेटी है, जो दिल्ली से मीडिया की पढ़ाई करके आई है। इंटर्नशिप के तहत वह गुड्डू के लोकल केबल चैनल से जुड़ती है, जहां दोनों में प्यार हो जाता है। यहां तक तो ठीक था, मगर कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब रश्मि गुड्डू के साथ लिव इन करके उसे परखना चाहती है। मुद्दा यह है कि रश्मि के पिता त्रिवेदी जी अभिनेता नाजिम खान के लिव इन का कड़ा विरोध कर उसकी फिल्मों को बैन करवा चुके हैं। अब उनके पार्टी सदस्यों का कहर मथुरा के लव कपल्स पर बरस रहा है। उसकी पार्टी के मेंबर्स प्रेमी जोड़ों को देखते ही उनका मुंह काला करने से नहीं चूकते। ऐसे में गुड्डू का दोस्त अब्बास (अपारशक्ति खुराना) तिकड़म लगाता है कि चैनल के लिए की जानेवाली एक स्टोरी के लिए वे लोग ग्वालियर जा ही रहे हैं, तो 20 दिन के इस असाइनमेंट में दोनों ग्वालियर में लिव इन करके एक-दूसरे को आजमा सकते हैं।

रिव्यू: निर्देशक लक्ष्मण उतेकर ने अपनी फिल्म के जरिए लिव इन जैसे बेहद ही सामयिक विषय को बहुत ही खूबसूरती से उठाया है। फिल्म बहुत ही लाइट मोमेंट्स के साथ शुरू होती है। फर्स्ट हाफ में ज्यादा कुछ घटता नहीं, मगर सेकंड हाफ में कहानी कई मजेदार टर्न्स और ट्विस्ट के साथ आगे बढ़ती है। निर्देशक ने शादी और लिव इन के बहाने मोरल पुलिसिंग पर भी कटाक्ष किया है, मगर बहुत ही हलके-फुलके अंदाज में। फिल्म जेंडर इक्वॉलिटी, कास्ट सिस्टम और छोटे शहर की सोच को भी छूती है। फिल्म के फर्स्ट हाफ में गुड्डू और रश्मि के लिव इन के दौरान घरवालों का उनकी खोज-खबर न लेना खटकता है। हालांकि सिचुएशनल कॉमिडी के मजेदार पल पूरी फिल्म में भरपूर मनोरंजन करते हैं।

गुड्डू के रूप में कार्तिक बेहद प्यारे लगे हैं। उनके एक्सप्रेशन का भोलापन और आंखों की ईमानदारी किरदार को बेचारा होने के साथ-साथ विश्वसनीय भी बनाती है। कार्तिक की बालसुलभ निश्चलता उनके किरदार को मजबूती देती है। कृति सेनन ने ‘बरेली की बर्फी’ के बाद एक बार फिर अपनी भूमिका को अपने अंदाज में निभाया है। दोनों की केमस्ट्री कमाल की रही है। फिल्म में पंकज त्रिपाठी ने बाबूलाल की भूमिका में अपने खास कॉमिक अंदाज में दर्शकों को खूब हंसाया है। अपारशक्ति खुराना भी अब्बास के रूप में याद रह जाते हैं। सपॉर्टिंग कास्ट फिल्म का मजबूत आधार स्तंभ साबित हुई है। सभी की कॉमिक टाइमिंग गजब की है।

फिल्म का संगीत कई संगीतकारों ने मिलकर दिया है और उनका यह प्रयास सफल साबित हुआ है। फिल्म का गाना ‘कोका कोला’ रेडियो मिर्ची के 8वें पायदान पर और ‘पोस्टर लगवा दो’ 13वें पायदान पर है।

क्यों देखें: आप अगर अपने वीकेंड को कॉमिडी के रंग में रंगना चाहते हैं, तो इस फिल्म को मिस न करें।

साभार – NBT

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