इंदौर को फिर कुचलते रहे अफसर, मुंह सील बैठे रहे नेता

0
151

इंदौर की सांस्कृतिक विरासत को एक बार फिर शहर के स्वंयभू शंहशाहों ने अपने पैरों तले बेरहमी से कुचला। अंग्रेजी राज में जितना खौफ पुलिसिया वर्दी का मिल मजदूरों और उनका सम्मान करने वालों को नहीं दिखाया गया होगा, उतना खौफ दिखाया गया। तुगलक और औरगंजेब को जिस तरह से भारतीय और हिंदूओं को अपने पैरों के सामने झुकाने और लाइन में खड़ा रखने की आदत थी, उसी तरह इन आधुनिक तुगलकों और औरंगजेबों ने मिल मजदूरों की आन माने जाने वाली झांकियों को अपने हिसाब से अपने (लट्ठमार) तरीके से जेल रोड पर लाइन से खड़ा करवा दिया। जिन्हें शहर की परंपराओं को सही तरीके से चलाने की जिम्मेदारी है, वो लोग माई-बाप बनकर हरकतें करते नजर आए। उन्होने झांकी मार्ग इस बार भी बदल दिया और फिर चिकमंगलुर चौराहे से झांकियां की शुरूआत करवाई। शहर ही नहीं आसपास के जिलों और अन्य जगहों से इन झांकियों को देखने के लिए लाखों लोग सड़कों पर उतरते हैं, जो पूरी रात इन्हें निहारना चाहते हैं। लॉ एंड आर्डर के हिसाब से ये इतनी भीड़ बहुत बड़ी बात होती है। लेकिन इन कुंभकर्णों और मैनेजमेंट की दुकानों के लिए ये कोई मसला नहीं है। एक दिन पहले साहब को होश आया था कि शहर में झांकियां निकलने वाली है, क्योंकि उसके पहले वो अपने बड़े वालों की जीहुजूरी में लगे हुए थे। एक दिन में व्यवस्थाओं को देखा और उसे सही भी बता दिया। इन्हें ये भी होश नहीं था कि झांकियां निकलेंगी तो उन्हें नंबर भी देना होते हैं, उसके लिए निर्णायक कमेटी बनाई जाती है। अंटागफील होकर बेसुध पड़े साहब लोग प्यास लगने पर कुआं खोदने वाले इन सूटधारियों ने अनंत चतुर्दशी चल समारोह शुरू होने के चार घंटे पहले अचानक एक कमेटी बना दी। इस कमेटी में जिन लोगों को रखा गया था उन से पूछा भी नहीं गया कि वे फ्री भी हैं या नहीं। साहब ने बोल दिया तो वो ही कानून माना जाए इस सोच के अफसरों को ऐन मौके पर ही एक बहुत बूरा चांटा भी पड़ा और वो चांटा था निर्णायक मंच की कमेटी के दो सदस्यों जो कि मुझ जैसे ही अखबारनवीस और शहर की परंपरा को लेकर चलते हैं, उन्होने खुद को इससे अलग करना। उन्होने साफ कह दिया हम इतने फोकट नहीं है की तुम बोलोगे तो तुम्हारे आगे झूक जाएंगे। शहर की पंरपराओं का टूटना लगातार जारी है और हो भी क्यों नहीं क्योंकि कभी अपने अंदाज और अपनी आवाज से पूरे प्रदेश ही नहीं पूरे देश को हिला देने वाले इंदौर के नेता भी इनके चाटूकार जो बन चुके हैं। इन्दौर के नेताओं की हालत इन अफसरों के घर के बाहर बंधे कुत्तों से कम नहीं दिखती मुझे। क्योंकि इनमें किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं है कि वे अफसरों को कुछ बोल सकें। अफसरों की मनमानी को रोक सकें। झांकी मार्ग झांकी ही नहीं बल्कि उन गरीबों का भी सहारा रहता है जो साल में एक रात में छोटा मोटा धंधा, पोहे, जलेबी, चाय की दुकान लगाकर अपने परिवार को पालते हैं। ये नेता भूल गए कि सालभर बाद चुनाव है। और यदि उस समय इन्होने शहर की परंपरा, मूल्यों और पहचान की बात की ओर जनता में से किसी ने सवाल कर दिया की अफसरों की चाकरी के सिवा आपने शहर को कब-कब धोखा दिया तो क्या जवाब दोगे। परिक्रमा के जरिए कुर्सी की चाहत रखने वालों से शहर को उम्मीद है, ये भी एक गलतफहमी ही है।

FB_IMG_1504619660320
वरिष्ठ पत्रकार नितेश पाल की कलम से साभार

https://niteshkeahsas.blogspot.in/2017/09/blog-post_72.html?m=1

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here